दरभंगा:
जब भी बिहार के ऐतिहासिक राजघरानों की बात होती है, तो दरभंगा राज का नाम अपने आप सबसे पहले ज़हन में आता है। वैभव, प्रशासनिक क्षमता, शिक्षा, संस्कृति और दूरदर्शिता के लिए प्रसिद्ध दरभंगा राज न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे देश के सबसे समृद्ध और प्रभावशाली राजवंशों में गिना जाता रहा है। हाल ही में दरभंगा राजघराने की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी के निधन के बाद एक बार फिर यह ऐतिहासिक राजवंश चर्चा में है और लोग इसके गौरवशाली अतीत को याद कर रहे हैं।
दरभंगा राजघराने से जुड़ा एक ऐसा रोचक और अद्भुत प्रसंग भी इतिहास में दर्ज है, जो आज के दौर में भी लोगों को हैरान कर देता है। यह वह समय था जब दरभंगा के महाराज ने अपने निजी महल तक रेलवे लाइन बिछवा दी थी। आम लोगों के लिए रेलवे जहां एक साधन था, वहीं दरभंगा महाराज के लिए यह सुविधा उनके महल के दरवाजे तक मौजूद थी। महाराज के लिए अलग से प्राइवेट रेलवे स्टेशन का निर्माण कराया गया था, जहां ट्रेन सीधे आकर रुकती थी।
दरभंगा के महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह का सबसे सुंदर और भव्य महल माना जाने वाला नरगोना पैलेस उस दौर में शाही वैभव का प्रतीक था। इसी नरगोना पैलेस तक रेलगाड़ी पहुंचती थी। आज भी नरगोना क्षेत्र में रेलवे स्टेशन के कुछ अवशेष मौजूद हैं, जो इस बात के गवाह हैं कि कभी यहां महाराज का निजी रेलवे टर्मिनल हुआ करता था। ये अवशेष उस समय की तकनीकी प्रगति और राजघराने की प्रभावशाली हैसियत को दर्शाते हैं।
इतिहासकारों के अनुसार वर्ष 1874 में मोकामा से दरभंगा के नरगोना टर्मिनल तक रेल लाइन बिछाने की योजना बनी थी। उस समय अंग्रेजी सरकार इस परियोजना पर काम कर रही थी, लेकिन दरभंगा महाराज ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने न केवल रेलवे के लिए आवश्यक भूमि उपलब्ध कराई, बल्कि निर्माण कार्य के लिए श्रमिकों की व्यवस्था भी स्वयं करवाई। यह उस दौर की बात है जब भारत में रेल नेटवर्क अभी शुरुआती अवस्था में था।
भारत में पहली रेलगाड़ी वर्ष 1853 में मुंबई के शिवाजी टर्मिनस से ठाणे के बीच चली थी। इसके लगभग 21 वर्ष बाद दरभंगा क्षेत्र में रेल सेवा की शुरुआत हुई। महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह ने बरौनी से बाजितपुर तक रेल लाइन के निर्माण में भी अहम योगदान दिया। आगे चलकर इसी रेल लाइन को विस्तारित करते हुए दरभंगा तक पहुंचाया गया और इसे नरगोना पैलेस से जोड़ा गया। इस रेल खंड पर 1 नवंबर 1875 को पहली बार ट्रेन का संचालन शुरू हुआ था।
दरभंगा राजघराने का यह गौरवशाली अध्याय हाल के दिनों में इसलिए भी चर्चा में आया है क्योंकि सोमवार 12 जनवरी को राजघराने की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का निधन हो गया। वह लगभग 94 वर्ष की थीं और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। महारानी कामसुंदरी देवी, दरभंगा के अंतिम महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी और अंतिम पत्नी थीं।
महारानी कामसुंदरी देवी सामाजिक और परोपकारी कार्यों से भी जुड़ी रहीं। उन्होंने महाराजा कामेश्वर सिंह की स्मृति में महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन की स्थापना की थी, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में कार्य करता रहा है। उनका निधन दरभंगा राज परिसर स्थित कल्याणी निवास में हुआ।
महारानी के निधन के साथ ही दरभंगा राजघराने का एक ऐतिहासिक अध्याय औपचारिक रूप से समाप्त हो गया, लेकिन उनके द्वारा छोड़ी गई विरासत, ऐतिहासिक स्मृतियाँ और गौरवशाली किस्से आज भी लोगों को उस दौर की शान और रुतबे की याद दिलाते रहेंगे।